फितरत - एक कविता है उनके ज़ज़्बे की जो कभी हार नहीं मानते। उनके लिए जिनकी आदत ही होती है अंतिम दम तक लड़ने की, संघर्ष करने की।

फितरत: कविता

ऐसा नहीं कि
मुद्दा समझ नहीं आता,
या बदलते हालात का 
इल्म नहीं है मुझे । 
 
पर हार मान लूँ 
ये फितरत में नहीं, 
और यूँ ही जाने दूँ 
ये मेरी ख़सलत नहीं ।  

ना हर्ज़ मुझे
मिटटी फांकने का
और 
ना ही धूल खाने का है,
एक दफा तो
ज़ोर आजमाइश करूंगा ही,
अंजाम चाहे जो भी हो।


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