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ज़िंदगी का देवता: कविता (Zindagi ka Devta - Hindi Poem

ज़िंदगी का देवता: कविता

जब जब तेरे चेहरे ने
हँसी के मुखोटे पहने,
तब तब इस जग ने
तुझको सराहा |

पर शोक रहा तो बस इतना
की जग की इन अँधी आँखों ने
तेरा मधुर हास तो देखा
पर अंतर में छिपा गहरा विराग न देखा,
तेरा ठिठोलापन तो देखा
पर उस कचोटती पीड़ा को न देखा
जिसने तुझे मृत बना दिया है |

मैं जानता हूँ –
ऐ ज़िंदगी के देवता !
कि तू नित अंतर मंथन में पिसता है,
और तेरा हृदय रह रह कर रिस्ता है,
पर….
शायद समय तेरे साथ नहीं
और
जानता हूँ मैं यह भी
कि तू यह सब है जानता |

तुझे पता है हाल अपना,
तुझे पता है भाग अपना,
फिर भी रे तू
कैसे कलेजा अपना थामता |
हँसी हर वक़्त तेरे चेहरे पर,
हँसता है तू नहीं कि
दुःख तेरा तोड़ा कम हो जाये,
पर भय है तुझे,
कहीं दुःख तेरा,
पता ना किसी को चल जाये |

फिर भी चल रहा है तू
हँसता – हँसाता
और ज़िंदगी को ढोये – ढोये |
वाह रे ! ज़िंदगी के देवता,
अज़ीब है दास्ताँ तेरी
न कुछ कह सका
और
न कुछ सुनने को ही है बाकी ||


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